राजस्थान की धरती केवल वीरों और राजाओं की नहीं, बल्कि उन समाज सुधारकों की भी रही है जिन्होंने अपने जीवन, धन और साहस से सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष किया। जालौर जिले की सांचौर तहसील के किलवा गांव के महान पुरुष श्री रूपाराम जी तरक ऐसे ही एक ऐतिहासिक समाज सुधारक थे, जिनका योगदान केवल आंजणा/कलबी समाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए दिशा देने वाला सिद्ध हुआ। उन्होंने टक्का प्रथा जैसी अमानवीय कुरीति को समाप्त कर 1600 कन्याओं का ऐतिहासिक सामूहिक विवाह सम्पन्न करवाया।
टक्का प्रथा और वंशावली की पुरानी परंपरा
आज आंजणा/कलबी समाज की जो वंशावलियाँ राव समाज के पास सुरक्षित हैं, वे पहले तुरी समुदाय के पास रखी जाती थीं। उस समय समाज में एक कठोर प्रथा प्रचलित थी, जिसके अनुसार कन्या के विवाह के लिए तुरी समुदाय को सोने का एक टक्का देना अनिवार्य था।
इस टक्का प्रथा के कारण अनेक निर्धन परिवार, विवाह योग्य होने के बावजूद अपनी बेटियों का विवाह नहीं कर पाते थे। यह सामाजिक अन्याय लंबे समय तक समाज पर बोझ बना रहा।
रूपाराम जी तरक द्वारा टक्का प्रथा का अंत
इसी अमानवीय प्रथा को समाप्त करने का ऐतिहासिक कार्य श्री रूपाराम जी तरक ने किया। उन्होंने समाज में सामूहिक विवाह का आयोजन कर अपनी ओर से सभी कन्याओं के लिए सोने का टक्का स्वयं प्रदान किया।
इस सामूहिक विवाह के बाद पुरानी व्यवस्था को समाप्त किया गया और आंजणा/कलबी समाज की वंशावली वाचन और अभिलेखन का कार्य राव चंडीसा समाज को सौंपा गया।
आज भी “राव नामो वाचे” में सबसे पहले रूपाजी तरक का नाम लिया जाता है, जो उनके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है।
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
राजस्थान के जालौर जिले की सांचौर तहसील से लगभग 9 किलोमीटर पश्चिम स्थित किलवा गांव में सोमदेव तरक के घर सन् 1350 ई. (संवत 1406) में एक पुत्र का जन्म हुआ, जिनका नाम रूपाराम रखा गया। सोमदेव अपने समय के सज्जन पुरुष और गांव के चौधरी थे। समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी।
दुर्भाग्यवश अल्पायु में ही रूपाराम के माता-पिता का स्वर्गवास हो गया। भाइयों द्वारा पालन-पोषण से इनकार किए जाने पर उनके पिता के धर्मभाई, एक व्यापारी बालदी, उन्हें अपने साथ ले गए और पुत्रवत पालन किया।
जब बालदी की पत्नी ने रूपाराम जी का विवाह अपने समाज में कराने की बात कही, तो यह सुनकर रूपाराम जी ने अपने मूल गांव किलवा लौटने का निर्णय लिया। लगभग 15 वर्ष की आयु में रूपाराम जी पुनः अपने जन्मस्थान किलवा लौट आए।
धन, संघर्ष और सामाजिक प्रतिष्ठा
किलवा लौटने के बाद रूपाराम जी ने अपने पिता द्वारा सुरक्षित रखे गए धन एवं अपने अधिकार में आने वाली भूमि के लिए भाइयों से बात की। भाइयों ने शर्त रखी कि यदि वे सोने की एक सरू देंगे, तभी भूमि एवं धन लौटाया जाएगा। कुल व भूमि अधिकारों को पुनः पाने हेतु वे गांव के ठाकर के पास पहुँचे।
ठाकर के कहे अनुसार भाइयों ने भूमि लौटाने के बदले एक सरू भर सोने की मोहरों की मांग रखी, जिसे रूपाराम जी तरक ने सहर्ष स्वीकार किया।
ठाकर की माता, जिन्होंने पहले सोमदेव जी को धर्मभाई बनाया था, ने भी अपने घर से मोहरों से भरी हथेली रूपाराम जी को देते हुए कहा—
“ले भतीजे, अपनी समाज को उजला करना।”
उस समय जोधपुर दरबार में राठौड़ वंश का शासन था। रूपाराम जी तरक कर (रवाना) जमा करने के लिए जोधपुर पहुंचे। वहीं उन्होंने सामूहिक विवाह आयोजन तथा टक्का प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने के उद्देश्य से अपनी बात रखी।
राजा उनके विचारों से प्रभावित हुए और सहयोग का आश्वासन दिया। बदले में रूपाराम जी ने आर्थिक एवं सैन्य सहयोग देने का वचन दिया। उस समय सांचौर क्षेत्र में राव श्री वरजांग जी का शासन था।
राव श्री वरजांग जी द्वारा प्रदान की गई सोने की मोहरों से किलवा में स्तंभों पर तोरण बांधा गया। इन स्तंभों पर रूपाजी तरक, राव वरजांग जी सहित कई व्यक्तियों के नाम अंकित हैं।
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| किलवा गांव सांचौर में स्थित रूपाराम जी तरक से जुड़ा ऐतिहासिक शिलालेख |
ऐतिहासिक गीत और शिलालेख का प्रमाण
इसी ऐतिहासिक प्रसंग का प्रमाण एक प्रचलित राजस्थानी गीत में मिलता है, जिसमें संवत 1441 तथा विभिन्न राजवंशों की भूमिका का स्पष्ट उल्लेख है। यह गीत रूपाराम जी तरक के कार्यों का प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोत माना जाता है।
चढ़यो वरजांग परणवा सारू, घण थट जांन कियो घमसाण ।। संवत चौदे सो वरस इकताळे, जादव घर जुड़या जैसाण ।।1।। राण अमरांण उदयपुर राणो, भिड़या भूप तीनों कुळभांण ।। चड़ हठ करण ज्यूँ छोळां दे, चित्त ऊजळ जितयो चहुआंण ।।2।। आँजणा मदद करि हद ऊपर, साढ़ा तीन करोड़ खुरसाण ।। मशरिक मोद हुओ मन मोटो, सोवन चिड़ी कियो चहुआंण ।।3।। किलवे जाग जद रूपसी कीनो, आयो सोनगरो धणी अवसाणं ।। मांगो आज मुख हुतां थे म्हांसूं, भाखे मशरिक राव कुळभांण ।।4।। कुळ गुरू तणी मांगणी किन्ही, तांबा पत्र लिखियो कुळ तेण ।। चहुआंण वंश ने आँजणा शामिल, दतक वर सुध नटे नह देंण ।।5।। साख भड़ मोय आज सब शामिल, गौ ब्रह्म हत्या री ओ गाळ ।। वेण लेखांण साख चंद्र सूरज, शुकवि बेहु कुळ झाली साळ ।।6।। टंकन मीठा मीर डभाल।
सात विशी (140 कन्याओं) का सामूहिक विवाह
उस समय टक्का प्रथा के कारण अनेक कन्याओं के विवाह रुके हुए थे। इसलिए रूपाराम जी तरक के निवेदन पर राव श्री वरजांग जी द्वारा प्रारंभ में सात विशी (140) कन्याओं का विवाह सम्पन्न कराया गया।
संवत 1441 का ऐतिहासिक सामूहिक विवाह (1600 कन्याएं)
बाद में संवत 1441 (सन् 1385 ई.) में समस्त हिंदू समाजों की सहभागिता से लगभग 1600 कन्याओं का भव्य सामूहिक विवाह किलवा गांव में आयोजित किया गया। इस ऐतिहासिक आयोजन में 14 वर्णों की कन्याएं शामिल थीं।
श्री रूपाराम जी तरक केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि सामाजिक सुधार की वह चेतना थे, जिसने कुरीतियों को चुनौती दी और समाज को नई दिशा दी। उनका जीवन आज भी यह सिखाता है कि सच्ची समाजसेवा धन या सत्ता से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और त्याग से होती है।
सादर आभार : गुमानजी पटेल
